मेरा मन और एकांत
ऊष्मा जिसे छिपाए वो नितांत हो रहा है हां शायद ये मेरा मन फिर एकांत हो रहा है 🌹 लंबे सफर के बाद भी जो न बता सके वो वृतांत हो रहा है हां शायद ये मेरा मन फिर एकांत हो रहा है 🌹 न कुछ समझ आ रहा न मै समझा पा रहा हो सकता है तभी अब ये अंदर से फिर अशांत हो रहा है हां शायद ये मेरा मन फिर एकांत हो रहा है 🌹 मिनटों,घंटो और महीनों के रूप में शायद मेरा जन्मांत हो रहा है हां शायद ये मेरा मन फिर एकांत हो रहा है 🌹 अपने खुद के बनाए बंधनों में ये फिर सीमांत हो रहा है देखो न शायद ये मेरा मन फिर एकांत हो रहा है 🌹
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