सच की बेचैनी
जब भी कुछ मैं बोलूं,उन्हें बगावत सी लगती है, सामने सबके सच खोलूं तो सियासत सी लगती है, हकीकत बयां करता हूं मैं अपने जहन की, पर कुछ लोगों को क्यों बौखलाहट सी लगती हैं। मैंने इंसानियत पर बोला है,कभी इंसान पर नहीं, मैंने लोगों के काम पर बोला है,किसी के नाम पर नहीं, मैं तो कहता हूं वही जो मुझे कहना सही लगता है, मुझे सुनकर... उन लोगों को फिर क्यों झनझनाहट सी लगती है। मैंने भूख पर बोला,जो हर पेट को लगती है, मैंने गरीबी पर बोला,जो हर जगह दिखती है, मुझें मासूमों की तस्वीर उदासी सी लगती है, उन्हें बचाने बोला तो... कुछ लोगों को क्यों घबराहट सी लगती है। ना मैं झुकता हूं, ना किसी को झुकाने पर बोला है, जो लगता है गलत, बस उसे बताने को बोला है, तुम्हें खटका मतलब कुछ खोट है तुममें, मेरे रवैये से उन्हें खटपटाहट सी लगती है, सच के दो शब्दों से... उनके पैरों में क्यों हड़बड़ाहट सी लगती है।
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