अबके कवि खद्योत सम
आज कवियों की भीड़ बढ़ रही, हर गली-कूचे, चौक-चौराहों पर; यत्र-तत्र खद्योत जैसे कवि देख, लोग चुस्की लेते हैं इन बौराहों पर। चारों ओर सोशल साइट्स भरे हैं, नए नए कवियों को उफनाने से; मानो जैसे बाढ़ आती है बरसात में, तो मछलियों के खेत में उपलाने से। पन्ने दर पन्ने नित-नित भर भर कर, जतला रहे कवि होने का एहसास; पाठक अब सोच में पड़कर सोचता, कितना पढ़ता रहे दिन भर बकवास। कवि होना कतई गुनाह नहीं है , पर कुछ तो मूल उद्देश्य बतलाओ; जिसे पढ़कर कतिपय मिले शिक्षा, ऐसी छाप तो लेखन में दिखलाओ। नहीं तो,क्यों न पढ़ें सुर,तुलसी,बिहारी वर्मा,गुप्त,प्रसाद,दिनकर व निराला; रामचरित मानस के दोहे,चौपाई, छंद या हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला। नरेंद्र सिंह 24.12.2023
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