प्रेम श्राप
मैं मदद श्राप की माँग रहा ,मुझे अमर प्रेम का श्राप मिले।। ना जी पाऊँ ना मार पाऊँ, मैं विरह अग्नि में जल जाऊं कुछ ऐसा पश्चाताप मिले,मुझे अमर प्रेम का श्राप मिले।। मैं प्रेम करूं,उसे जी भर के , मैं उसके रंग में रंग जाऊं ये प्रेम मेरा एकतरफा हो,जिसे प्रेम करूं,न कभी पा पाऊं मैं चीखूं, रोऊं,चिल्लाऊं, मैं नित पल मृत्यु ही मांगू और मृत्यु भी ना मुझे मिले,कुछ ऐसा मुझको श्राप मिले मुझे अमर प्रेम का श्राप मिले।मुझे अमर प्रेम का श्राप मिले।। मैं इश्क नहीं मैं करूं इबादत,मैं अमर प्रेम का वर मांगू मैं चाहूं मैं हो जाऊं उसका,उसपर अपना जीवन वारु मैं उसी एक की भूख प्यास के लिए निरंतर रम जाऊं मैं उसके लिए समर्पित हो के,उसके चरणों में बस जाऊं मैं चरण पूज लूं,अपने उनका,मै उन्हें स्वयं शंभू मानू मैं बन जाऊं,शक्ति उनकी,मैं उनमें खुद को पहचानूं मैं रहूं सदा बन चाकर उनका,बस इतना ही मै मांगू उनके बिन जीवन, जीऊं ना मै, बिछड़ के उनसे मर जाऊं पर रहे अभागी किस्मत मेरी,मृत्यु भी मुझको नहीं मिले मुझे अमर प्रेम का श्राप मिले,मुझे अमर प्रेम का श्राप मिले।।
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