धज्जीया
धज्जीया ====================== वासना मे पला तु रावण, " स्त्री " जाती को समज कर खीलोना, ऊठा लाया पर नारी को...., समजकर आबला. एक वनवासी क्या ऊखाड लेगा, तेरा यही सोच बनी तेरे बरबादीका कारण, घमंडी रावण. एक वनवासी पुत्र बना तेरे काल का, कारण, पाठान्य पंडीत होकर भी, तेरे वासनामय दील के कारण. ना पहचान पाया विष्णू अवतार राम को, स्त्री लंपट रावण, संधी का फायदा न ऊठाकर, संधी सेवक का आपमानही, ले डबा तुझे गहरे मायाजाल मे. बची कुची सेना और बुद्धी की, धज्जीया उडाली दी...., वानर सेना और राम ने, वानर सेना और राम ने. ====================
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