संकट में पर्यावरण
बचाए दिन, बचाए धन, मान, सम्मान होंगे कभी सोचा बचाया न असमा क्यों? आखिर क्यों- क्यों न बचाया? रहता पर्वत ज्येष्ठ सा खड़ा, बचाए आई आपदा से, देती सींच, पिलती निर्मल जल कल कल से बहती नदियां शोर मचाए पड़ी इधर गिरना, उधर गिरना पर्वत की छोटी से गिरना, खाई चोट बहुत है, पर बेजान बोलती नही है। देते छाया, प्राण थके को बैठाए नीचे, देता कुछ खाने को, आज वो भी रो रहा, पर मानव तेरे लिए हस्ते हस्ते कट रहा बोलता नही बेजान है धरा ने दी शरण तुझे, यूं अपना घर बनाया है, हो गया बड़ा तो उसका घर फेकवाया है। सोचा न कभी खाक हो जायेंगे रहे न जो हमारे साथ ये। साफ सा दिखता कभी अनन्त जहां, आज है परदुषित कर भर गैस के रंग दिए, ओजोन भी रोता है कैसा मेरे समछ हुआ। देख नदियों की पीड़ा, सुन पेड़ों को आहत, खड़ा पर्वत सिमट रहा मैली अनंत असमा, बोलना न पाए बेजुबान आया अनंत आंखो में आंसू जिसे चाहकर पोछ न पाए, रह पुकारते जायेंगे, कभी न वापस आयेंगे,
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
