शीर्षक :तथाकथित महारथी
सभे कहे की हम्महीं पुरोधा, मगही के ही हम्महीं जोधा। अप्पन गिरोह के मंच बनावे, ओकर मालिक स्वयं कहावे।। अप्पने के ऊ लमहर बतावे, अप्पन गुन अप्पने ही गावे। अप्पन लिखल के कहय ऊ बेस, दुसर के मगही से लगय ठेस।। अप्पन के बड़ाय ल रखय आस, दोसर के लिखल लगय बकवास। जब कोस कोस पर बदलय बोली, तो दुसर पर नय करs ठिठोली।। सगरो के मगही के आदर करs, जादे नखड़ा तिला नय तू धरs। अप्पन बोली के नय तू थोपs, अप्पन लठिया के नय तू रोपs।। तभीये होत हम्मर मगही महान, नै तो संस्कृत नियन होत नसान। तोरा चाहे लगे जेते पर-पर, नरेन्द्र बोलतो बतिया खर-खर।। नरेंद्र सिंह, गया 08.03.2025
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