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सुना है पेंच कही और लड़ गए हैं, पतंग मेरी थी कभी, अब आज़ाद लगती हैं। वो मुहब्बत के नाम पर सिर्फ शक्ल देखता है, ऐसे शख् की सोच वाहियात लगती हैं। वो हमियत नही फिर भी मै मुकम्मल हुँ, वो दिखता है तो यकीनन आग लगती हैं। उसे इश्क़ है? इश्क़, जानते भी हो क्या है? अक्ल आपकी भी जनाब खराब लगती हैं। कोई दूसरा ईलाज ढूँढो रे मेरी मर्ज का, ये दवा भी मुझको शराब लगती हैं। अब भी इश्क़ जिंदा है, उसकी छोटी सोच मे, ये कोरी कोरी बाते है, अब ख्वाब लगती हैं। कबूतर खुश है की कोई फंदा नही किसी चिट्ठी का, मैंने सोचा, इसकी जिंदगी खराब लगती हैं। दूर रखो मुझसे, खराब लगती हैं, इश्क़ की बुँदे, अब आग लगती हैं ।
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