खैर छोड़ो वो ना समझ थी !
मैं अक्सर देर कर देता ह, पर कुछ आरज़ू हमारी भी थी, खैर छोड़ो वो ना समझ थी, ऐतबार की वफ़ा की भूख हमे भी थी, पर उसकी नज़ाकत से वो घबराती थी, अफसाने हज़ार हुए खिदमत में उसकी, खैर छोड़ो वो ना समझ थी, आफ्ताब के नूर के आबशार में खिलती, वो मौतज़ा, ख्वाबीदा नवाज़िश की रिवायत, रिवायत के रक्स में खेलती रहती थी, खैर छोड़ो वो ना समझ थी, मैं करता हू रश्क-ए-क़मर एक टक उसको देखकर, मैं इज्तिरार में बैठा रहता मुंतज़िर करता, वो अपने आशना के संग दास्तां लिखती रहती थी, खैर छोड़ो वो ना समझ थी, मैं बा-दस्तूर, दिवांगी में एहतियात खो बैठा, जा गिरा फलक से उसके इश्क के फिरदौस में, जमीं पर फिरदौस उसकी हसरत थी, खैर छोड़ो वो ना समझ थी । – गजेंद्र चारण(psychogajen)
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