दुआर से झाँकती यादें..
जहाँ कभी रजाई गद्दे और खाटें कम हो जाते थे, फिर भी किसी तरह जगह पाकर हम सो जाते थे, जहाँ बाहर कुछ खा पी लेते थे अनाज के दामों पर, ढेले चलते थे कभी बाग़ में कच्चे पक्के आमों पर, जब गुठलीयां दबाकर जमीन में पेड़ उगाते थे, जहाँ खेतोँ में बजाकर थाली पक्षियों को उड़ाते थे, जब टायरों पे लगा थपकियां सड़कें दौड़ा करते थे, दादाजी के नाम पर हर जगह सीना चौड़ा करते थे, कभी बात किसी से बिगड़े तो दादाजी संभाल लेते थे, हम दुलारे थे बहुत हमारा अक्सर वो ख्याल लेते थे, लालटेन के आगे किताबों से हम रिश्ता लगाते, खाने की एक आवाज पर हम झट से दौड़ लगाते, अब जाता हूँ तो रंग छोड़ते घर रिसियाये लगते हैं, गाँव भर के लोग जैसे इनको लावारिस कहते हैं। जिसे खींच तोड़ दातुन रोज दाँतों की घिसाई करते थे, उस बूढ़े नीम को देख उदास सब जग हंसाई करते थे अधिक झुकता देख खतरा जान उस पर भी आरी चल गई, आज जैसे ही दुआर निहारा तो उसकी भी कमी खल गई। एक ही घर में न जाने कितने घर बनते चले गए, घर गैरों से ज्यादा तो अपनों से ही छलते चले गए, कागजों में अपने नाम हुऐ घर फिर भी खाली रहे, लटकते हुऐ ताले हर फागुन इस बात की गवाही रहे, बहुत कमाने और बनाने में हम खोखले होते जा रहे हैं, जितना हासिल हो रहा है उससे अधिक खोते जा रहे हैं, इसी हाल पर चले तो ये सब चित्रों में दिखानी पड़ेगी, आने वाली पीढ़ियों को ये सब बस एक कहानी लगेगी,
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
