अधूरा
उम्र के आधे पड़ाव में उलझनों के जाल में घोर तिमिर के साये में मन मायूस सिसकता है । अनजाने तृष्णा की प्यास में अदृश्य कस्तूरी की चाह में क्षद्म मायावी संसार में शेखर बेवजह मन दर-दर भटकता है । अधूरी कहानी अधूरे सपने अधूरी सृष्टि अधूरी तृप्ति अपने अधूरे अस्तित्व पर पूर्णत्व का आभाव झलकता है। कहीं तो जाना है साथी सब रह जाना है बाकी रिश्ते अपने सब माया है बंधनों से मुक्ति शाश्वत हैं। बस कर्म से मिली संतुष्टि ही खुशहाली रूपी अमृत प्रिय आत्म त्याज्य से बढ़कर कोई स्व उपकार का साधन नहीं।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
