सब अपनी मर्जी के मालिक .....
सब अपनी मर्जी के मालिक, बात हमारी कौन सुने । छोटा हो या बड़ा नाग, बस डसने को वह हमें चुने ।। मची हुई है अफरा-तफरी, कुटिल स्वार्थ में डूबी नगरी । मुखड़ा सना दूध में लेकिन; जहरीली है अंदर गगरी ।। सफल पुजारी वही यहाँ का, तिकड़़म का जो जाल बुने । सज्जनता का दंड समेटे, असफलता सिर खूब धुने ।। सब अपनी मर्जी के मालिक ..... अवसरवाद यहाँ है चलता, अपना ही अपनों को छलता । बहती- गंगा हाथ धो लिए; मानव वही फूलता- फलता l आज अनैतिकता के हाथों, पाप हो रहे कई गुने । कल तक जो अच्छे लगते थे, गेहूँ सारे आज घुने ।। सब अपनी मर्जी के मालिक .... हुई आस्था गूँगी- बहरी, निष्ठा भी फिर यहाँ न ठहरी । खलने लगा अकेलापन भी; बढ़ती रही वेदना गहरी ।। कैसे दूर हो सके पीड़ा, बैठे हैं सब जले- भुने । मानवता हो गई खोखली, कोई खुद को नहीं हुने ।। सब अपनी मर्जी के मालिक .......
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