अभिलाषा
मैं शुद्ध सात्विक प्रेम पुजारी सर्वस्व अर्पण का अनुरागी बन दधीचि मैं होम हो जाऊँगा प्रयासों से नई राह बनाऊँगा। अपना अहम स्व सब त्याज्य परहित ही जीवन का आधार आपकी हँसी व आपकी खुशी मुझे संतुष्टि देगी नीत बारंबार। मेरी अपेक्षा है बस इतनी तुम उड़ो चाहे जितनी सहयोग से सपने को पा लो उद्देश्य के लिए जी जान लगा दो । निर्मल मन विनम्र व्यवहार सिद्धि हेतु नीत कौशल अभ्यास पूर्ण समर्पण से पूरी हो जिम्मेदारी मिले सबको विजय में हिस्सेदारी । मेरा कोई चाह मेरे लिए नहीं है मेरा कोई स्वार्थ, स्व हित नहीं है मैं आपके कल्याण की कामना लिए नीत अपने हिस्से की समिधा जलाता हूं। मैं तो यात्री हूं चला जाऊँगा तुम तो सूरज बन चमकना सुगंधित फूल बन महकना स्व कीर्ति से चहूँओर दमकना ।
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