मिट्टी मै
कहकर मुरझा गई कलियां कल खिलना ही तो है । जी लो तुम जिंदगी मग्न रहकर फिर मिट्टी में मिलना ही तो है । क्या ये फैला आसमा , क्या ये बिछी जमी क्या तेरे काम का इस जहां में । कौन तेरे आंसू देखे कौन दुख कौन तेरा साथ दे श्मशान में । खिली हूं आज तोड़ ले गए सब मुरझा गई मैं, छोड़ के गए सब तू हस तेरी हसीं बंट जाएगी तू रो अकेली छंट जाएगी । जिंदगी दो पल का दौर मुश्किल का ही तो है जी लो तुम जिंदगी मग्न रहकर फिर मिट्टी में मिलना ही तो है । हर शाम को धूप गई कुछ मै कली सी रूठ गई । ढलती शाम सिमटा हृदय ओर मै एकांत में टूट गई । क्या है हवा मै मोह की मदिरा क्या है ठंडी सांझ की रुचिरा । कल फिर सूरज निकालना ही तो है जी लो तुम जिंदगी मग्न रहकर फिर मिट्टी में मिलना ही तो है । कोई नहीं यहां तुम्हारे साथ चले । नहीं कोई नहीं जो तुमसे बात करे । सब झूठे बंधन है सब सत्य से परे । मै कितना खुद को पत्थर कर लूं ढोंग सा मै दिनभर कर लूं फिर जाकर पन्ने मै पिघलना ही तो है जी लो तुम जिंदगी मग्न रहकर फिर मिट्टी में मिलना ही तो है। कहकर मुरझा गई कलियां कल खिलना ही तो है जी लो तुम जिंदगी मग्न रहकर फिर मिट्टी में मिलना ही तो है। ज्योति
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
