प्रेम
प्रेम ======================= हीर, रांझा, से लेकर लैला, मजुनु, कीतने आये और चले गये, कीतनो ने तो ग्रंथ लीखा, ईस ढाई अक्षर प्रेम पर. पर पुरी बात कोई समजा न पाया, ईस ढाई अक्षर माया जाल पर, असमे ईन्सांन से लेकर भगवान तक, परेशान है आजतक. प्रेम अक्षर का कोई अंतही नही, सब किनारा धुडंते रह गये , ईस स़मंदर से निकला न कोई, आजतक किनारो पर. ईसे पाकर कोई गुम है, तो कोई ईसे पाने मे गुम है, ईस ढाई अक्षर के खेल को , आजतक कोई समजले मे गुम है. आजतक कोई समजले मे गुम है. ======================
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