कागज और कलम
मैंने कलम रखा ही था, कि इंकार कर दिया इस कागज़ ने, कहता नहीं लिखेगा तु उसके बारे में और, मुझे तंग कर दिया हैं तेरी इस आदत ने, ना भुलता हैं, ना भुलने देता हैं मुझे, हर शाम उस अफ़सोस की दरिया में धेकेल देता हैं मुझे, थोड़ा आगे बढ़ पन्ने पलट, कुछ तोड़ निकाल इस वेहेम का, मुझे बकक्ष दे नाम मेरा लकीर नहीं, मुझ पर थोड़ा सा तो रहेम खा !!!!
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