भरत की चिंता (चौपाई )
भरत लगे अब अति अकुलाने, कतिपय संशय लगे सताने। त्याग दिए क्यूँ मुझको भाई, जब यह करनी की है माई ।। राम नहीं रज भर अभिमानी, परम तत्त्व के वे प्रभु ज्ञानी। फिर भी क्यों ये उनकी माया, महल छोड़ क्यूँ जंगल भाया।। चौदह वत्सर अब तो बीते, रुधिर घूंट हूँ पीकर जीते । प्राण आस में अटका अबतक, प्रभु न मिले तो जिन्दा कबतक।। मेरे उर में वही बसे हैं, साँस डोर की वही कसे हैं। व्याकुल हैं सब अवध निवासी, अबतक रघुवर क्यों वनवासी।। रघुवर तो हैं सबके त्राता, क्यों कर मुझको भूले भ्राता। राम नाम का फेरा माला, मन में घमंड तनिक न पाला।। प्रभु मन में क्यों संशय घेरा, जीवन है अब असह्य मेरा। आखिर मुझसे गलती कैसी, त्यागे पय च्युत मक्खी जैसी।। 11.03.2025
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