आग
आग ======================== आग इतनी भरी पडी है, सर्द रातो मे भी खुन खौल जाता है. आंदाज क्या बया करु, कुछ शब्द ही नही सुझते। कयामत का खेल पुरा आज ही खेलकर, तेरा नामोनीशानही मीटादु, मैदानकी की राह क्यु देखु, मै खुद मैदान बना दु। मेरी आगसे तु वाकीफ नही है, तु ईस कदर देख ना मुझको, मैदान तो बहोत दुर की सोच है। कही मीरी नेजरोसेही जलकर, राख ना हो जाये ....!। दोस्त से जादा मुझे दुष्मन पसंद है, नजर बहोत दुर की है, बाज को तो कुछ टाईम लगता है, महोल बणाने मे। सामना हुआ कभी तो, नजर मत मीलाना, आग भरी पडी है इतनी............, आग भरी पडी है इतनी। =====================
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
