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पिंजरे में कभी जो कैद रही, गुमसुम गुपचुप बेचैन रहीं, है खुले गगन में उड़ती वो, खूंखार बाज़ से भिड़ती वो, है गिरती पड़ती पर लड़ती वो, न हटी वो चिड़िया डटी रही, निर्भीक होकर बस खड़ी रही, न झुकी कभी,न अब डरपोक रही, पिंजरे में कभी जो कैद रही।
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