दीमक जाति एक समान
कब खत्म होगी ये प्रथा कभी खत्म होगी भी या नहीं मुझे नफरत हैं अपनी जाति से मुझे नफरत हैं जाति को मानने वालो से जाति दीमक के समान वो कीड़ा है जो हमारे अंदर की मानवता को खोखला कर देता है जो हमारी संवेदनशील भावनाओ को बंजर भूमि के समान जर्जर कर देता है जो हमारी सोचने समझने की बुद्धि को क्षीण कर देता है बीते कई सालो पहले इसी जाति ने कइयों की ज़िंदगी नारकीय बना कर छोड़ा है उनपर घोर अत्याचार व शोषण किया है खैर इन बातों से आप परिचित होंगे मैं बता दू ,ये जाति न पहले खत्म हुई थी न अभी खत्म हुई है, क्यूंकि जाति नाम का ये कीड़ा हमारे ज़हन में बस चुका है जो राजनीति, समाज, परिवार व मनुष्यो के खून के कतरे तक में विद्यमान हैं।
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