जीवन की किताब
जीवन की इस किताब में ... न जाने कितने ख्वाबों के पन्ने हैं । जिम्मेदारियों का कवर चढ़ा रखा है हमने , जो इस किताब को सुरक्षित तो रखती है , मगर खोलकर पढ़ने का , खुलकर जीने का साहस नहीं कर पाते हैं । डर होता है की कही; किताब खोले तो पन्ने खराब ना हो जाए ... कोई दाग न लग जाए ... इन पन्नों में । इस डर से हम , जीवन की इस किताब को... खोलने से पहले ही बंद कर देते हैं । जिम्मेदारियां का कवर के सहारे.. उस किताब को लंबा जीवन तो दे देते है , पर ... उसका सही उपयोग नहीं कर पाते हैं । फिर ... वह ख्वाब भी उसी में बंद पड़े रह जाते हैं । कवर को मर्यादा मानकर , आगे नहीं बढ़ते हैं ... फिर ... जब जिम्मेदारी के तले दब कर , हम थक जाते हैं , हमारा मन होता है उन पन्नों को पढ़ने का, खोलने का , पर देर हो चुकी होती है ... ना वो समय , ना वह शक्ति , ना वह उड़ान भरने के पंख रह जाते हैं । फिर वह किताब पूरी होकर भी अधूरी रह जाती है.... पूर्वी प्रांजल जैन
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