निर्माण
कुछ पाने के लिए, कुछ खोना पड़ता है। जरूरत पड़े, तो हद से गुजरना पड़ता है। यूं ही नहीं मिलती, चाहत ए मंजिल । दर्द हस कर , सहना पड़ता है । दर्द के बिना आराम नहीं होता , मंजिल को पाना आसान नहीं होता । होते होंगे अविष्कार रोज नए , पर विध्वंस के बिना निर्माण नहीं होता । कि जब धरती टूटती है , तो पौधे का जन्म होता है । टूटते हैं बादल , तो बारिश होती है । टूटता है तारा , ख्वाहिश पूरी करता है । टूटती है चट्टान , उपजाऊ मिट्टी से मैदान बनता है । टूटकर बिखर जाना , उतना भी खराब नहीं होता । विध्वंस के बिना , निर्माण नहीं होता । तुम उठो नया निर्माण करो , टूटे टुकड़ों से ही नई शुरुआत करो । कि टूटने के बाद भी प्राण बाकी हैं जबतक , तबतक फिर से कोशिश इक बार करो । फिर से कोशिश इक बार करो।।
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