इंसाफ....
अब बस करो , बहुत मंजर देख लिए , आज फिर एक बेटी का गला काटकर भेंक गए , धरने पर बैठ गए , मोमबत्तियां जलाकर... कुछ दिनों में भूल भी जाओगे, अफसोस जताकर, सोचो आजादी का पर्व , मनीषा के लिए कैसा रहा होगा, मारपीट, बाल नोचना , बेचारी ने कितना उत्पीड़न सहा होगा, उस घर का आंगन जो उसकी आवाज से चहक जाता था.. जो आंचल उसकी झलक को तरस जाता था... सोचो, जो कलाई अब सुनी रह जायेगी, अब वो भी किसी कोने में, इंसाफ की उम्मीद लिए बैठ जाएगी !
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