क्या चाहते है हम ?
ये खुला दृश्य , ये आसमां में उड़ती हुई चिड़ियां.. कुछ ना देखने को मिलेगा मानो लग चुकी हो बेड़ियां। प्रकृति के साथ रहो तो मिलता है कितना सुकून, पर हममें फिर भी लगी हुई है पैसों की धुन। भूल चुके है हम ये सारा सुख, बस सोचते रहते है क्यों है ये दुख तो कभी वो दुख। सोचा जाएं जरा शांति से बैठकर .. तो कर ही क्या रहे है हम, धन, मोह, माया, क्रोध , द्वेष , ईर्ष्या से सब गवां रहे है हम। ना रह गई है जीवन में कही शांति , ये करेंगे, वो करेंगे ..बस बसा रखी है मन में लाखों भ्रांति। मैं खुद नहीं हूं इन सब से आजाद, सब पता होते हुए भी मैं भी होना चाहती हूं भौतिक रूप से आबाद। सबको है भगवान से काफी शिकायतें, बस हर कोई मांगते रहते है मिन्नते। हमारा ये जीवन यूंही निकल जाना है, आज हमारा जाना है ..तो कल तुम्हारा जाना है। फ़सें हुए है इस जीवन की असीम भावनाओं के समंदर में, अगर मैं तुमसे पूछूं.. तो क्या तुम झांकोगे खुद के अंदर में? दूसरों पर आरोप लगाना है बहुत आसान, पर क्या आज तक तुमने नहीं क्या किसी का अपमान? खुद के बारे में हम बुराई सहन नहीं कर पाते, ये जो क्रोध , ईर्ष्या , कपट के भाव है वो दहन नहीं कर पाते। बस डूबे जा रहे है इस भौतिक संसार में, ना ढूंढ पा रहे है रोशनी , बस जाते जा रहे है अंधकार में। - the mini
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
