जयकरी छंद/चौपई छंद
शीर्षक- नारी नारी तू हो माँ निःस्वार्थ, जिन्दा रहती तू परमार्थ। भला कौन है मातु समान, दुनियाँ दो अब माँ को मान।। वंश बढ़े यह इन पर भार, देती दोनों कुल को तार। भरती बच्चों में संस्कार, शक्ति नहीं है अब लाचार ।।1 बेटी सहती अति अपमान, मान नहीं है पुत्र समान। भ्रूण मरण के ये शिकार, जन्म अगर तो हाहाकार।। माँ ही करती कृत्य जघन्य, दोष किसे दे कोई अन्य। भेद करे जब पालन हार, जिसके कारण ये लाचार ।।2 नारी का क्यों अबला नाम, नर से ज्यादा करती काम। इसको समझो मत लाचार, जननी देवी का अवतार।। रचना करती है ये सृष्टि, संतति पलती जब दे दृष्टि। इसके बल है यह संसार, पुरुष इन्हें दो इज्जत प्यार।।3 नरेंद्र सिंह, गया पुनः प्रेषित
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