महफिल ए श्याम
सूरज की आखिरी किरणे ढलते हुए दे गई रात के अंधेरों में टिमटिमाते हुए तारो को रोशनी का मुकाम। वहीं सागर किनारे बैठे एकाकी में डूबा मायूस आदमी अपने किस्मत की लकीरें पृष्ठभूमि में चलते शहर के शोर के साथ आजमाने की कोशिश में नाकाम हुए अपने ही गीतों से अनजाने का मन बहलाता चल गया।
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