तलाश
राहों पे मुसाफ़िर खूब मिले, पर मिला न कोई जिससे दिल मिले। मुसीबत में साथी तो खूब मिले, पर मिला न कोई जिससे हँसी खिले। शाम को चादर समझ, दिन की धूप को ढक दिया। उन मुसाफ़िरों और साथियों को, एक अलग जगह रख दिया। तारे बहुत थे आसमान में, चाँद-सी हँसी कोई नहीं थी। फूल बहुत थे कीचड़ में, पर कमल-सा कोई खिला नहीं था। न जाने कब मुशायरों की तलाश में हम जनाज़ों से जा खड़े हुए। न जाने कब हँसते-हँसते हम ख़ुद ही मुसीबत में गिरते हुए। अब शायद और न रूह देख पाएगी, न शायद ये जिस्म और सह पाएगा। तलाश है उस पैग़म्बर की, जो फिर से वो हँसी दे पाएगा।
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