🌾 "मिथिला की पुकार" 🌾
🌾 "मिथिला की पुकार" 🌾 जहाँ सिंहासन था, वहाँ अब खंडहर क्यों हैं, दरभंगा महाराज की धरती में पत्थर क्यों हैं? जहाँ विद्या की गूंज थी, संस्कारों की धारा, आज वहाँ सन्नाटा है, टूटी छतें और गंदा नज़ारा। मिथिला – जो जनक की थी, सीता की शान थी, काव्य, कला, संस्कृति की जहाँ पहचान थी। विद्वानों की भूमि, तिरहुता की बात निराली, आज वही मिथिला है, पड़ी लाचार-भुखमरी वाली। बिहार सरकार से बस इतना सवाल है, क्या मिथिला सिर्फ चुनावी बवाल है? विकास के नाम पर सब बस जुमला बन गया, रेल-रास्ता, उद्योग सब सपना रह गया। दरभंगा एयरपोर्ट पर फोटो खिंचवाते हैं नेता, पर सड़कें अब भी पूछती हैं – कहाँ है मेरा बेटा? पानी में डूबी गलियाँ, अस्पतालों का हाल बेहाल, यह कैसा न्याय है सरकार, ये कैसा कमाल? न रोजगार, न कारख़ाना, न बचपन की पढ़ाई, बस वादों की गठरी है, और झूठी सफ़ाई। मिथिला के युवा पलायन को मजबूर हैं, अपनों के घर छोड़, दिल्ली-बंबई में मजदूर हैं। जागो सरकार! देखो मिथिला की दशा, इतिहास की भूमि माँग रही है आशा। दुर्गा-सप्तमी, मखान, पाग, पान का मान, बस भाषण नहीं, दो असली सम्मान।
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