तेरे हाथ में मेरा हाथ हो
तेरे हाथ में मेरा हाथ हो, बस यही मुकम्मल साथ हो। न मंज़िल की कोई फ़िक्र रहे, न रास्तों की कोई बात हो। ये जो उँगलियों के बीच खाली जगह है, जैसे मेरे लिए ही बनी कोई पनाह है। जब तेरी पकड़ मज़बूत होती है, थमी हुई ज़िंदगी फिर से जवान होती है। जब दुनिया की बातें कठोर होती हैं, और उम्मीदें टूटने की ओर होती हैं। तब तेरी हथेली की वह हल्की सी छुअन, मेरे भीतर के डर को राख करती है। लगता है जैसे खुदा ने अपनी रहमत भेजी है, मेरी बेरंग दुनिया में तेरी चाहत भेजी है। हमें बोलने की ज़रूरत कहाँ पड़ती है? जब नज़रे ही नज़रो से मशवरा करती हैं। तेरे नज़रो से बहता है जो सुकून, वो लफ़्ज़ों की बंदिशों से बहुत ऊपर है। तेरी लकीरें जब मेरी लकीरों से उलझती हैं, किस्मत की गुत्थियाँ खुद-ब-खुद सुलझती हैं l तब मुझे हकीकत का ये आलम भी एक ख़्वाब सा लगता है, जो शायद कभी टूटने की कगार पर लगता है।
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