सुकून
सुकून-ए -जन्नत मिले भी कैसे जब वो नजर में आता नहीं है फ़िक्र तो उसको रहती है फिर भी खुद से कभी जताता नही है हैं वादे कितने बातों में उसके मगर कभी भी निभाता नहीं है कहता है मिलने से बढ़ती है चाहत इसीलिए मिलने वो आता नहीं है चाहत कब बन जाएगी आदत और वो कोई आदत लगाता नही है लगती हैं बाते बुरी ये हाँ मगर उससे गुस्सा आता नहीं हैं मैं फिर भी करती हूं उसकी वक़ालत लोग कहते हैं वो मुझको चाहता नहीं है
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