नेता अऊ कवि
तुरंते खादी पहन के,तू धरलs नेता के चोला ; तुकबन्दी छोड़ के, कोय नेता के ढोबs झोला। अगर खायला चाहs हs तू, खुबे हराम के मेवा; स्वांग रचs खूब, जनता के करिहs झूठो सेवा। कोय मंत्री औ विधायक,उनखा जाके पकड़ लs ; चमचा गिरी करके तू , कसके उनखा जकड़ लs। कवि बने खातिर काहे ला, कइले हs तू ई जिद्द; नेता बनs, बढतो मान,कवि होवे घोड़ा के लीद। कौआ कुत्ता पूछे नञ कवि के,राह चलते आझ; नेता बन जा ,तब देखs,पूजे लगतो तोरा समाज। नेता अउ कवि में ,एगो राजा भोज ,दूजे तेली गंगू; पढ़ल ,लिखल आझ, अनपढबो नेता के आगे पंगु। नरेन्द्र सिंह 04.12.2023
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