नियति का उद्घोष
चिंता के छद्म आवरण में, व्यंग्य-बाण बरसाते हैं। संवेदना के अभाव तले, रिश्ते भी सौदे बन जाते हैं।। मेरे परिश्रम की तपिश से, भाग्य का लेख जलेगा अब। जो मुझ पर अट्टहास करें, समय उन्हें झुकाएगा तब।। आक्षेपों की आँधी चाहे, मेरा पथ अवरुद्ध करे। मैं धैर्य का दीप प्रज्वलित कर, हर विघ्न को निर्मूल करूँ।। प्रलयंकारी यह वेदना भी, मुझे विचलित कर पाएगी क्या? मेरी साधना, मेरी श्रद्धा, मुझे पराजित कर पाएगी क्या? जो आज उपहास कर रहे, कल स्तुति गान करेंगे। मेरे श्रम का दिव्य प्रकाश, नियति का उद्घोष बनेगा।।
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