मन
हा थोड़ी मायूस हु आज कल लगता कोई ठहराव आया हैं मुस्कुराना तो आदत है मेरी कहते है मौसम रंगीन आया है न जाने बेपरवाह मन क्या चाहता करू शिकायत तो सुनता कहां है है जो पसंद मुझको चुनता कहां है कोई सुन ले खामोशी मेरी भी तो क्या जाता है न जाने बेपरवाह मन क्या चाहता है भरी पलके अल्कों में छुप जाती है कभी चलते कदमों की आहट रुक जाती है पकड़ कर हाथ आगे करे तो क्या जाता है न जाने बेपरवाह मन क्या चाहता है नेहा फौजदार 😊
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