इलाहाबाद का विद्यार्थी जीवन
सत्रह अठारह साल की छोटी सी उम्र में गांव की पगडंडियों से उठ कर ,एक गठरी में दाल ,चावल ,आटा बांध कर जब एक लड़का खड़खड़ाती हुई बस में अपने हौसलो के उड़ान के साथ बैठता है तब उसके दिमाग मे बत्तियां जलती है वो बत्तियां लाल होती है वो बत्तियां नीली होती है , और यही सोचते सोचते वह कब बलिया, मऊ , आज़मगढ़ , देवरिया से इलाहाबाद पहुंच जाता है उसको पता ही नही चलता । फिर यहाँ से शुरू होती है जिंदगी में नौकरी की जद्दोजहद। जब लड़का अपने कमरे में कदम रखता है उस दिन उसकी एक ऐसी साधना शुरू होती है जो वो कभी अकेला नही करता , जब वह फॉर्म डालता है तो उसकी माँ किसी देवी माँ की मनौती मान देती है , उसकी बहन मन ही मन खुश होती है ,उसके बाप दस लोगो से इसका जिक्र करते है और जब उसका परीक्षा जिस दिन रहता है उस दिन माँ ब्रत रहती है शाम को उबला आलू खा के सो जाती है इस कामना के साथ की उसका लड़का आने वाले अपने पूरे जीवन भर फाइव स्टार होटल में खायेगा । यहाँ लड़का कोचिंग करता है अपने सीनियर , अपने भाई आदि की सलाह भी लेता रहता है , वैसे यहाँ के सीनियर प्रतियोगी छात्रों की आदत है आप को बिना मांगे ही सलाह खूब देते है । अपने तैयारी में धार देता हुआ आगे बढ़ता है । कुकर की बजती सीटियों के बीच मोबाइल में बजता हूआ गाना जो आप को लगभग हर कमरे में सुनाई देगा ,। यहाँ का प्रतियोगी मैनेजमेंट भी बहुत अच्छा सीख लेता है दस बाई दस के
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