मेरी पहचान
कविता: मेरी पहचान अब पंख अपने खोलूंगी, उम्मीदों से आसमान तौलूंगी। ना सहूं किसी की बंदिशें, अपने लिए नए रास्ते खोजूंगी। सूरज से अब बात करूंगी, चांदनी की सौगात भरूंगी। धूल नहीं, सितारे छू लूंगी, ख़ुद को ख़ुद से रूबरू करूंगी। किसी दरवाजे पर दस्तक नहीं, अपनी राहें ख़ुद ही बनाऊंगी। ना मागूंगी कोई परछाई, अपने दम से रोशनी लाऊंगी। गगन मेरा, धरती मेरी, हर पल मेरी, मर्जी मेरी। नजरें झुकी तो सिर उठाऊंगी, हार मिली तो भी मुस्काऊंगी। मैं चुप न रहूंगी, ख़ुद की धुन में बहूंगी। दुनिया को नया रंग दिखाऊंगी, अपने नाम की पहचान बनाऊंगी।
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