स्त्री
घर में कैद स्त्री के बिना घर ऐसे सूना लगता है, जैसे पिंजरे में चिड़िया को न देखकर पिंजरा सूना लगता है। शादी से पहले ही अपना घर भी पराया लगता है, शादी बाद पराया भी अपना सा लगता है। चांद से चेहरे पर पर्दे का पहरा लगता है, पर्दे में से सुंदर संसार भी धुंधला सा लगता है। घर में कन्या का जन्म कोढ़ सा लगता है, पढ़ाई लिखाई से ज्यादा दहेज का भार लगता है। बचपन में गुड़िया थी, पर खेल न अपने थे, हर कदम पर बंधन, हर राह में अधूरे सपने थे। कभी पढ़ना चाहा, तो कहा — “लड़कियाँ घर सँवारें”, कभी उड़ना चाहा, तो बोले — “आसमान नहीं तुम्हारे!” शादी हुई तो मानो सौदा हो गया, सपनों का बदला दहेज से लिया गया। ससुराल में कदम रखा तो उम्मीदों का भार मिला, सेवा की कसमें , पर सम्मान एक बार भी ने मिला। अपनी हंसी के पीछे सारे ग़म छिपाती है, परिवार की खुशियों के लिए अपना अस्तित्व भी भूल जाती है। रातों में गिले बिस्तर पर जगती है बच्चे की हंसी के लिए, सारा दिन काम में टूटती है घर की खुशी के लिए। अपने आसुओं को तकिए से छिपाती है, अपनों के छोटे से दर्द में दौड़ी चली आती है। वो सब सहती है — ताने, बोझ, अपमान, फिर भी कहती है, “मैं ठीक हूँ” बस यही है उसकी पहचान। वो स्त्री है, वो ममता है, वो शक्ति है, मुसीबतों के आगे खड़ी वो ढाल है, जीवन में नई आशाओं भरी किरणों की वो एक नई चाल है।
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