एक और निर्भया....
कहीं दरिंदो की आहट देखी , कही प्रशासन की खाक मिली ... आज फिर एक निर्भया, पड़ी नहर के पास मिली, पाया अकेला खुद को , मैं अनहोनी भांप गई ... देख बर्बरता जानवरों सी , रूह भी कांप गई , हिसाब सब देखूंगी , कर्मों की बही बनाऊंगी, जन्म मिले या न मिले , लड़की बनकर नहीं आऊंगी, इतनी चीखी , जितनी चीख मेरे अंदर थी , बेकसूरी का मांगा है सबूत , तो पूछो चार दिशाओं से , मैं तय दायरे के भीतर थी !
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