सपने सच करने चल पड़ा हूं मैं।।
क्या? उलझूं निज अंतर्मन से , क्या?अब थक हार गया हूं मैं!! क्या? संघर्षों की लपटों से कदाचित विचलित हो गया हूं मैं!!! जो होगा देखा जाएगा ,नव वर्ष नई उम्मीदें लाएगा, नई शुरुआत होगी,नई जीत होगी,होंगे सपने भी सच। न झुकना है,न रुकना है ,बस आगे बढ़ेंगे और बढ़ते रहेंगे।। क्या?उलझूं निज अंतर्मन से क्या? अब थक हार गया हूं मैं!! अरे नहीं! संघर्षों से दो दो हाथ कर चुका हूं मैं, उम्मीदों का इक सशक्त सेतु निर्मित कर चुका हूं मैं, हम लड़ेंगे ,जीतेंगे नए साहस के साथ आगे बढ़ेंगे। अपने अंतर्मन से ये दृढ़ निश्चय कर चुका हूं मैं।। हां! कदाचित था मेरा मन विचलित,अब उसको बंद पिटारे में फेंक चुका हूं मैं, नए साल में नई सोच से ,सपने सच करने चल पड़ा हूं मैं।। क्या?उलझूं निज अंतर्मन से क्या? अब थक हार गया हूं मैं!!
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