व्यर्थ समर्पण
शलभ तू आखिर ऐसे पगलाते क्यों हो; दीये की लौ पर आखिर रिझाते क्यों हो। जगमग दीप तेरे लिए भला जला कहाँ है? इसमें तेरी मौत के अलावे भला कहाँ है? तेरी जान जाती है, कुछ भी मिलता नहीं; तेरी मौत से दीप,कभी भी पिघलता नहीं । क्या समझूँ तेरा, ये तिल तिल कर मरना; क्या अर्थ है, इस तरह पूर्ण समपर्ण करना। नरेंद्र सिंह 04.12.2023
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