स्व
दिल दुखता है मेरे बातों से इतना जहरीला व्यवहार मेरा मैंने कितना विषपान किया है इसका नहीं कभी हिसाब लिया। जान भी दे दूं तो उन्हें संतोष नहीं मैं आनंदित तिल- तिल जलने में मेरा सीख भी यही मेरा आदत यही मुझे अभ्यास है हवाओं से लड़ने का। मेरे स्व का कोई अस्तित्व नहीं सबके स्व में मेरा सर्वस्व समाहित अनजाने में भी कोई आहत हुआ तो नतमस्तक प्रयास मेरा उन्हें मनाने का। मेरे मन के छालों का कोई मोल नहीं अपनों के घाव पर मलहम लगाता रहा सेवा में भी तो शांति नहीं अपयश मिला पीड़ा में भी मैं निरंतर प्रेम गीत गाता रहा । कोई तो पूछे हाल मेरा की कैसे जीता हूं रोजाना कितनी पीड़ाओं से मैं गुज़रता हूं छलनी होता है मेरा मन और मेरा आत्मा परहित में प्रयासों की समिधा जलाता हूं। आसान नहीं मुझ सा जीवन जीना सूरज की तपिश में रोज झुलसना थोड़ी चमक जो है वो अपनों की है मेरा अस्तित्व अपनों की खुशी में है ।
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