और एक बहन की आबरू लूट गई..
एक सपना जिसको था वर्षों संजोया, पाने में ना जाने क्या – क्या खोया.. कर्म चुना था सेवा का – रख दिल में अरमान कई, रह गए अधर में सपने सारे – चली मेरी जान गई.. चीख रही थी रूहें मेरी, मार रहा था दिल दहाड़, काश बन आए कोई कलयुगी कृष्ण और सुने मेरी पीड़ा पुकार.. टूट रहा था नश नश मेरा थी ऐसी असहनीय पीड़ा, हवस के भूखे भेड़िए ने थोड़ा भी कसर ना छोड़ा.. हुई थी मैं लड़की पैदा क्या ये था अभिशाप मेरा, या सेवा को धर्म समझा बस यही हुआ पाप मेरा.. लड़ते,लड़ते उस दरिंदे से हिम्मत मेरी टूट गई, लूटी आबरू, ना कोई सहारा मेरी सांसे टूट गई.. आ रही हूं पास तेरे हे ईश्वर ले यह कामना, दुबारा इस धरा पर लड़की बना मत भेजना...
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