"कह देती ना एक बार "
पहली टोक तेरी थी मां.... जिसने मुझको रोका था। लड़की होती दूजे घर की ऐसा तूने बोला था। अट्ठारह वरस यह कह कह कर ही.. तूने मुझको पाला था। परिवार तेरी है जिम्मेदारी, यह तो तूने समझाया था। औरत होती परिवार की धूरी, यह भी तूने बतलाया था। कह देती ना एक बार... तेरा जीवन अपना है। जीना तू हर उस पल को.. जो भी तेरा सपना है। मैं भी थोड़ा सरल हो जाती मन की गांठें सुलझा पाती। वो घर तेरा अपना है... ऐसा तूने समझाया था। उनका सुख दुःख अपना है... बार बार यही बतलाया था। कह देती ना एक बार... अब दो घर तेरे अपने हैं। दीवारों पर अब भी बसते ... तेरे वो जो सपने हैं। दिल चाहे जब आ जाना.. अपने दिल को बहलाना। मैं भी थोड़ा सहज हो जाती.. अपना दुःख तूझसे कह पाती। पहली टोक तेरी थी मां.... जिसने मुझको रोका था। जब भी जीना चाहा खुलकर.. फिर मैंने खुद को रोका था। सपने अब भी वहीं खड़े हैं... दस्तक देते देहली पर। मन का आंगन मचल रहा है... गुनगुन करते बारी पर। खोलूं कपाट या अश्रुत कर दूं... असमंजस में मैं भी हूं। मन की सुन लूं या तेरी सुध लूं... अंतर्द्वंद में मैं भी हूं। कह देती ना एक बार... तू है खुद की जिम्मेदारी। मन ही मन की ताकत है... समझा देती ना एक बार। मैं भी थोड़ा चतुर हो जाती.. संबंधों की कूटनीति को, सूझ बूझ से हल कर पाती। कह देती ना एक बार... क्यों तूने मुझको रोका था, क्यों तूने मुझको टोका
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