सबक
शुद्ध सात्विक प्रेम पाने की आदत दुनिया में किसे कहां है आज शिव जिसने ताउम्र चालाकियां देखी हो उसे प्रेम में भी छलावा ही दिखेगा । बात आत्मिक प्रवृत्ति की है न आराध्य विध्वंसक प्रवृत्ति वाले को सृजन नहीं दिखेगा हमेशा पत्थर नहीं पिघलते हैं प्रेम से शंभू अमृत को भी विषैला करने की प्रवृत्ति से कौन बचेगा। तो क्या करें प्रेम करना छोड़ दें हम अपनी प्रवृत्ति से कैसे मुँह मोड़ लें ना रे नादान तु बस प्रेम किए जा बस मोह को त्याग निष्काम जले जा । तू दुखी है आज इसलिए की मोहपाश से बंधा है तोड़ दे इस बंधन को और आनंद ले आपार सुख का तेरी अपेक्षायें अपनों से तुम्हारे दिल को दुखाया है क्यों दोष देता है उनको मोह ने तुम्हें रुलाया है। सबक सिख ले आज अब से तु बस कर्म करने का अधिकारी है फल से विचलित होकर बन्दे कर्म से विमुखता बेमानी है।
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
