सफर बस का
बस की खिड़की से छनती थी धूप हल्की, पास वो बैठी थी, मुस्कान थी बिल्कुल कल्की। लगा जैसे वक्त ठहर गया हो वहीं, हर पल में बसी थी कोई मीठी सी गवाही। बातों का वो सिलसिला कुछ खास था, हर जुमला जैसे रूह को पास था। नज़रों में चमक, लफ़्ज़ों में मिठास, उस दिन का हर लम्हा था मेरे लिए एहसास। गाड़ी की रफ़्तार थी थोड़ी सुस्त सही, पर दिल की धड़कनें हो रही थीं तहे दिल से सही। चाहा था सफ़र यूँ ही चलता रहे, हर मोड़ पर वो मेरे साथ चलता रहे। अचानक कहीं बस ने दम तोड़ दिया, जैसे सपनों का रथ रुककर कुछ छोड़ दिया। घर से पहले, रास्ता था कुछ अधूरा, पर साथ चलने का वो ख्वाब था पूरा। मगर किस्मत ने फिर हमें मोड़ पर बाँट दिया, एक दूसरे को देखकर भी अनकहा सा छोड़ दिया। वो चली अपनी राहों में खो सी गई, और मेरी नज़रें उसी मोड़ पर रह गईं। फिर भी वो दिन था जज़्बातों की सौगात, हर पल, हर क्षण, बस वही थी मेरे साथ। अब चाहत है बस इतनी खुदा से मेरी, वो सफर लौटे फिर से, बने कहानी हमारी। जिंदगी की वो बस हो, और हम दो मुसाफिर, हर मोड़ पे साथ, हर पल हो मुफ़स्सिर। ना दूरी रहे, ना कोई किनारा बचे, बस तुम हो, मैं होऊं — और सफ़र हमारा बचे।
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