धार्मिक स्त्री
आंख मूंदकर चल दी मर्द के बनाए रास्तों पर। ना आर देखा न पार, बस हर संघर्ष पर पी के मुसीबतों में अपना बलिदान देतो गई। अग्नि परीक्षा पर खड़े बेदाग चरित्र की मासूमियत नम आंखों से झलकती रही। हृदय के हजारों टुकड़े उन दियो के चमचमाहट में जल कर राख हो गए, जिस आग में उसकी कुर्बानी का ज़िक्र तक नहीं।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
