हर हार में छुपी जीत
ज़िंदगी के इस मोड़ पे आकर खड़ा हूं मैं, जहां सवाल ही सवाल हैं, जवाब कहीं नहीं। सोचूं भी तो क्या सोचूं, सोचने को अब वो ख़्वाब नहीं, हर ख्याल दबा देता है डर, "लोग क्या कहेंगे?" यही सवाल सही। करूं भी तो क्या करूं, हौसले अब टूट चुके, हालातों की जंजीरों ने कदमों को जकड़ रखे। जब भी आगे बढ़ने की कोशिश करता हूं, अपनी ही परछाई कहती है, "तू क्या कर लेगा?" देखूं भी तो क्या देखूं, नज़ारों में वो बात नहीं, जहां नज़र डालूं, धुंध ही धुंध साथ नहीं। अपनी परछाई भी मुझसे दूर चली जाती है, हर मंजर जैसे मुझसे रूठ सा जाता है। सुनूं भी तो क्या सुनूं, हवाओं में वो गीत नहीं, सन्नाटों के शोर में दिल की आवाज़ कहीं गुम सी है। हर धुन बेमायने, हर सुर बेसुरा लगता है, ज़िंदगी का संगीत जैसे कहीं खो गया है। बोलूं भी तो क्या बोलूं, शब्द अब मुझसे रूठ गए, दिल के दर्द ने जुबां को जैसे चुप करा दिया। हर बात अधूरी, हर जज्बात बेमानी से लगते हैं, खुद से भी जैसे दूर हो चला हूं। फिर भी, इस अंधेरे से लड़ने की एक आस बाकी है, हर ग़म के परदे में छुपी रोशनी की तलाश बाकी है। हर हार के आगे, एक जीत का सपना बुनता हूं, चाहे खुद से ही क्यों न लड़ना पड़े, ज़िंदगी जीने का जुनून फिर से जगाता हूं।
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