आईना
●●● शमा की रौशनी भी अब तन्हा बरहम सी लगती है। तेरे इस शहर में सिसकियाँ हमदम सी लगती हैं।। देख कर हाल अपना खुद को वो पहचान न पाया। उसकी परछाई भी किस क़दर दरहम सी लगती है।। आजकल उलझा रहता है, ख़ुदी खुद से सवालों में। लब तो खामोश हैं पर आँखें यें सारा हाल कहती हैं।। आज कल आईना भी तुम से कुछ बेज़ार रहता है। तुम्हारी शक़्ल देखो तो "अयन" बेदम सी लगती है।। ●●● ©deovrat 'अयन' / नोएडा 01.06.2025
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