प्रेम ओर प्रीतम
संसार मे प्रेम का प्रतिफल पाने को मीरा बनने की प्रीत तुम में मुझे दिखाई देती है। एक नई अलख जगाने में मुझे में कबीरा के जैसे अंधविश्वास को तुम दूर कर रही हो। मोह भरी इस विरासत में एक मोहोब्बत का तुझमे ज़िंदा रहना ग़ालिब से कम नहीं। मैं जनता हूँ तुम प्रेम सीखा रही हो, तुम ही हो जो प्रेम की एक नई राह बना रही हो। क्या तुमने कभी यह सोचा है कि तुम्हे इस का अंदाज़ा भी है, मुझे लगता है तुम में इस बात का कोई गुरुर है भी नहीं है बिना भौतिक संसार मोह के तुम अपने अन्तः निहित तत्व से प्रेम की पाठशाला के दीप प्रज्वलित कर रही हो। तुम्हे इस प्रेम समंदर को लहरो के साथ बहते रहना है कि युगों युगों तक, प्रेम की हर नव प्रेमी इस प्रेम को देखे और नूतन युग सर्व गहराइयों को छूता रहे।
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