एक मुक्तक
"उसने रुतबा दिया …. दौलत और दीवारें दीं। चाह मेरी मगर थी .….….… प्यार का घर ।। इश्क़ है आग का दरिया …… सुन, अनुपम ! इम्तिहां है, यही कि …………… पार उतर ।।" : अनुपम त्रिपाठी
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