समाज का डर
समाज का डर जुर्म के बाद वो ज़िंदा है— ये बात ही उसे कटघरे में खड़ा कर देती है। जिस्म पर ज़ख़्म वक़्त के साथ कुछ कम हो जाएँगे, मगर रूह पर चढ़े सवाल उतरते नहीं— “क्यों निकली थी?” “कपड़े कैसे थे?” “चुप क्यों नहीं रही?” आईना जब देखती है तो चेहरा नहीं, लोगों की नज़रें नज़र आती हैं— जो देखने से पहले फैसला सुना देती हैं। रातें अब सुकून नहीं, सबूत बन जाती हैं, और ख़ामोशी कमज़ोरी समझ ली जाती है। माँ की दुआ डर-डर कर उठती है, भाई की आँखों में ग़ुस्सा और बेबसी है, बाप के चेहरे पर समाज का बोझ उतर आया है। वो पीड़िता है, फिर भी उसे समझाया जाता है “अब संभलकर रहना”, जैसे जुर्म उससे हो गया हो। मुजरिम भीड़ में खो जाता है, और लड़की भीड़ से डरने लगती है। ये कविता किसी को चोट पहुँचाने के लिए नहीं, ये तो समाज का वो आईना है जिसमें लोग देख सकते हैं— अगर देखना चाहें। क्योंकि डर उस जुर्म से नहीं, जितना उस सोच से है जो इंसाफ़ से पहले इज़्ज़त का फ़ैसला सुना देती है। Written by. Me
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